क्या हमने कभी स्वयं को पहचाना ?

 जीवन का यह आधारभूत प्रश्न है कि हम स्वयं को जाने जिसके बिना हमारा जीवन अधूरा सा लगता है I जीवन स्वयं को समझने की एक यात्रा है जब हम अपनी विशेषताओं और कमियों  को निष्पक्ष रूप से जान पायें, तभी हम स्वयं को जान सकते है i

 हर व्यक्ति मानवीय गुणों को अपनाकर जीवन पथ पर अग्रसर है I यही मानवीय गुण कम या अधिक हो सकते हैं I बिलकुल भी न हों, ऐसा संभव नहीं I यदि ऐसा है तो यह विचारणीय विषय है I हम अपना निरीक्षण, जिसे introspection भी कहा गया है, बड़े निष्पक्ष रूप से करें I जहाँ कमी हो, वहां स्वयं ही सुधार करके अपनी ही नजरों में सम्मानित हों I

आत्म सम्मान चाहने वाला कोई भी व्यक्ति यह नहीं चाहेगा कि वह अपनी कमियों को दबा कर अपनी विशेषताओं पर इतराए I हम अपने जीवन में जो भी करते हैं या जो कुछ हमें प्राप्त है वह हमारे विचारों की देन है I हम सर्वगुणसंपन्न हैं, हम कोई गलती कर ही नहीं सकते, जब अपने द्वारा पोषित यह मिथ्या भ्रम दूर हो जायेगा, उन्नति अपने आप होने लगेगी I

हम एक शिल्पकार की भांति अपने व्यक्तित्व पर पड़ी मिथ्या रुपी अनावश्यक धूल को हटाकर एक उत्कृष्ट कलाकृति के रूप में अपने व्यक्तित्व का निर्माण स्वयं अपने हाथों से करें I उस महान शिल्पकार ने हमें एक श्रेष्ठ रचना के रूप में इस धरती पर उतारा है उसकी श्रेष्ठ रचना सदा सर्वदा श्रेष्ठ बनी रहे, बस यही विचार बनाये रखना है I  यह विचार मन में एक शक्ति का संचार कर देगा और इस बात का अनुभव स्वत: ही होगा कि उत्तम संस्कृति का आचरण करते हुए हम कल्याण के मार्ग पर अग्रसर हैं I

 हम कभी परिश्रम से न घबराएँ I कर्मठ व्यक्ति के जीवन में आने वाली समस्या परिश्रम व संघर्ष से अपने आप ही सुलझ जाती है I परिश्रम ही व्यक्ति को सजीव बनाता है, उत्साही बनाता है i मन में यह दृढ संकल्प हो कि :-

              किसकी हिम्मत है जो लाये मेरी परवाज़ में कोताही I
              मै परों से नहीं होंसलों से उड़ता हूँ II

जिस लक्ष्य को पाने की हम इच्छा रखते हैं, दृढ संकल्प और परिश्रम के बल पर निश्चित रूप से उसे पा लेते हैं I

हम कभी तनाव में न रहें I एक महान विचारक ने कहा है, “ एक उत्तम व्यक्ति में तीन गुण होते हैं I पहला, वह दुश्चिंताओं से मुक्त रहता है,  दूसरा वह जटिलताओं  से दूर रहता है और तीसरा वह भय से मुक्त रहता है “ I जीवन को निर्बाध गति से जीने के लिए हम सदा प्रसन्न रहें I हम जो सोचें, जो कहें और जो करें, जब इन तीनों में तालमेल होगा तो हम निश्चित रूप से प्रसन्न रहेंगे I

हमारे जीवन की ख़ुशी हमारे विचारों पर निर्भर करती है क्योंकि जो हम सोचते हैं वैसा हमारा स्वभाव बन जाता है I हम कितने भी बनावटी हो जाएँ लेकिन हमारा मूल स्वभाव हमारे व्यव्हार से जाहिर हो जाता है I जो लोग ईमानदारी से काम करते हैं, वे सबसे ज्यादा खुश रहते हैं ,क्योंकि ईमानदारी का एक बल होता है जो हमें संतुष्टि और आत्मविश्वास प्रदान करता है और यही हमारे बच्चे भी संस्कार रूप में ग्रहण कर लेते हैं और हमें इस बात का पता भी नहीं चलता i दुनियां का सबसे खुश व्यक्ति वह है जो बिना स्वार्थ दूसरों की मदद करता है क्योंकि अनंत सुख मिलता है किसी की मदद करने में I गोस्वामी तुलसी दास जी ने भी रामचरित मानस में एक चोपाई के माध्यम से इस बात का उल्लेख किया :-

                     संत कष्ट सहे आपुहि सुखी करेजु समीप I
                     आप जरे तौं और को करे उजेरो दीप II

हम स्वयं पर भरोसा रखें I अपनी शक्तिओं पर विश्वास करें जो परमात्मा ने जन्म से ही हमें दी हैं I प्रभु ने हमें वह शक्ति प्रदान की है जो हमें घोर संकटों में भी बचा सकती है, वह है आत्मवलोकन की शक्ति I  हमारा मन एक बहुत बड़ी शक्ति है I निष्पक्ष रूप से जब हम अपने मन की अदालत में जाते हैं तो जो फैसला होता वह हमेशा सत्य पर ही आधारित होता है और यदि इस शक्ति का सदुपयोग किया जाये तो यह जीवन में कभी हारने नहीं देगी क्योंकि इस शक्ति के अनुरूप ही हमारा शरीर कार्य करता है I हमारी आदतें, हमारे कार्य और हमारी बातचीत हमारे व्यक्तित्व को दर्शाती है I जीवन में सफलता मन की इसी शक्ति पर निर्भर करती है i कवि प्रदीप के शब्दों में :-

                   कभी कभी खुद से बार करो कभी कभी खुद से बोलो I
                  अपनी नजरों में तुम क्या हो यह मन की तराजू पर तोलो II

अंत में एक और महान विचारक की चंद पंक्तियाँ के माध्यम से स्वयं को पहचानने का प्रयास करें:-

“ तुम जानते हो तुम कौन हो, तुम क्या हो ? शायद तुम नहीं जानते और मैं तुम्हें यही बताने के लिए यहाँ आया हूँ I तुम एक इंसान हो और भगवान् के बच्चे हो , तुम कुछ भी बन सकते हो, तुम कुछ भी कर सकते हो,  जो भी तुम करना चाहते हो, यदि तुम्हारे पास लक्ष्य है, विश्वास है, अच्छा मित्र है, और अच्छा चरित्र है“ I

          कुसुम आचार्य

 

 

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