In Memory of Late Pandit Shri Neelkanth Shastri Ji

Shri Neel Kanth Ji Shastri

श्री नीलकण्ठ शास्त्री जी जिनका जन्म 14 अगस्त सन्‌ 1923, राधा अष्टमी के. पावन दिवस पर मुलतान (अब पाकिस्तान) में हुआ पिता श्री चन्द्रभान जी गज्जा जो पुष्करणा ब्राह्मण परिवार के परम विद्वान श्री पुष्करदत्त जी के अनुज थे इस पुत्र के जन्म पर अति प्रसन्‍न हुए |

श्री नीलकण्ठ जी अपने परिवार में बड़े भ्राता श्री नंद किशोर गज्जा व॑ श्री बालमुकुन्द गज्जा जी से बड़े प्रभावित थे। जिनकी मेहनत व लगन से उनके जीवन में ऊर्जा का संचार हुआ। बाल्यावस्था में ही माता के प्यार से वंचित होने पर भी उनका जीवन मातृ-स्नेह से ओत-प्रोत रहा। ज़्येष्ठ भाभी श्रीमती शान्ति देवी गज्जा ने उनको सदैव पुत्र रुप में ही पाला-पोसा। मुलतान शहर से ही अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करते हुए अपने जीवन को उच्चित दिशा देने का प्रयास आरम्भ किया।

उच्च शिक्षा प्राप्त करने की लालसा में लाहौर भी गए पर पर्याप्त साधन न होनें के कारण जीवन सदैव संचर्ष्मय रहा। प्राज्ञ, विशारद व शास्त्री की परीक्षा पास करने के उपरान्त उनका लगाव आर. एस. एस. से हो .गया । संघ से जुड़ने के पश्चात्‌ निरंतर कई वर्षो  संघ प्रचारक का कार्य करते रहे। संघ के कद्दावर नेताओं के साथ कई बार जेल भी गए। कई वर्ष बीत जाने के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने की जिज्ञासा पुनः उनके हृदय में जागृत हुई। तत्पश्चात्‌ उन्होंने बी. ए. व एम. ए. (संस्कृत) की परीक्षाएँ पास कीं।

ज्योतिष व आचार्य की उपाधियों से अंलकृत ज्योतिष में अपने बहुमूल्य योगदान के कारण अनेक चिन्तन सभाओं में कई बार उन्हें विशिष्ट सम्मान प्राप्त हुआ। इस  मान-सम्मान, विद्वता एवं जीवन में भगवत भक्ति अपना पाने का श्रेय वो अपने ज्येष्ठ भ्राता पं. बालमुकुन्द गज्जा को देते थे। अपनी बहन श्रीमती नारायण देवी से उनको अतीव रनेह था। वो उन्हें “काकी’’ कहा करते थे। |

26 नवम्बर 1954 को पाराशर कुल के अति  सम्पन्न व शिक्षित परिवार में पं. मंगत राय पाराशर (डी सी. शूजाबाद) के सुपुत्र पं. मनोहर लाल पाराशर (फिल्म एडीटर व जर्नलिस्ट) की छोटी पुत्री कांता ‘ के’ | साथ परिणय सूत्र में बंधकर: गृहस्त जीवन में प्रवेश किया। अध्यापन कार्य मेंःसंलग्न शास्त्री जी अपने जीव॑न में विद्यादान व ज्ञान बॉटनें को अति उत्तम मॉनते थे॥

इसी का परिणाम है कि उनसे शिक्षित अनेक शिष्ये उच्च पदों पर आसीन हैं। हिन्दू कॉलेज सोनीपत में लगभग 30 वर्षों तक संस्कृत के विभागाध्यक्ष के रुप में जज करते हुए सन्‌ 1986 में सेवा निवृत्त हुए। अपनी चारों पुत्रियों को उच्च शिक्षा एवं श्रेष्ठ सस्कारो से पारांगत कर उनके विवाह उच्च कुलों में करवाए तथा अपने पुत्र राजीव का विवाह पुरोहित कुल के विद्वान श्री देवकीनन्द जी की सुपुत्री सुमंजू के साथ सम्पन्न करवाया अपनी पौत्री सौम्या से प्रेम, लाड-दुलार उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। अपने समस्त उत्तरदायित्वों को पूरा करते हुए श्रीमदूभागवत व श्रीमद्‌ भगवतगीता का अध्ययन, मनन व चिन्तन जीवन का एकमात्र लक्ष्य मान लिया और लगभग अठारह वर्ष परिवार से दूर रहते हुए दिल्‍ली के जनकपुरी क्षेत्र में श्री सनातन धर्म सभा में एक संत्र की भान्ति कथा उपदेशक का निस्वार्थ कार्य किया।

18  जुलाई सन 2010  को पत्नी श्रीमती कांता का आकस्मिक निधन उनके जीवन में एक बड़ा आघात बनकर आया।  इस विरह पीड़ा को सेहन करते हुए वह दिन का अधिकाँश समय पांच रतन गीता, गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ करने में बिताया  लगे अन्तत: 9 दिसम्बर सन्‌ 2011 को अपनी जीवन यात्रा को पूरा करते हुए बड़े ही सहज भाव से अपनी अन्तिम सांस ली तथा कामये दुःखदताप्तानाम प्राणीनाम आर्तिनाशनम्‌ के भाव को सफल करने के लिए बहुत पहले ही की गई इच्छा को मूर्त रुप देते हुए मरणोपरान्त नश्वर शरीर को परोपकार में लगाते हुए नेत्र दान किया।

ऐसे संत रुपी गृहस्थ का जीवन वृत्त प्रभु प्राप्ति के एक मात्र उद्देश्य के लिए हमारे मार्ग दीपक बन प्रेरणा स्रोत रहेगा ऐसी पुण्य आत्मा को बारम्बार प्रणाम।

-राजीव शास्त्री 20 न्यू कॉलोनी सोनीपत

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