In Memory of Late Shri Jindu Laal Gosain Ji

Jindu La Gosain Ji

शहर मेरे की इस धरा पर ऐसे लोग भी हुए।  जिनके डील डोल को भी देख कर उनके व्यक्तित्व को देख सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता था  की वे किस व्यक्तित्व की धनी थे । मस्त हाथी की चाल लम्बा चौड़ा जिस्म चौड़े माथे पर दहकता लाल तिलक पीछे की और सलीके से समरी लटकती घनी जुल्फे और उन्ही जुल्फों बंधी चोटी थी ।  जिस और से निकलते लोगो की नज़रे सहज ही उन पर अटक जाती , कहाँ गए वो लोग मे आज की कड़ी को आगे बढ़ाते हुए हम एक ऐसी  शख्सियत  का जिक्र करने जा रहे हैं जिन्हे अन्याय किसी भी सूरत में बर्दास्त नहीं था । 

भले ही वह  अपने व् किसी अन्य पर होता नज़र आया हो , किसी वजह से उन्हें अविभाजित पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री 1964 प्रताप सिंह कैरो दवारा अलमस्त की उपाधि से नवाजा  गया ,और नाम पड़ गया गोस्वामी  जिंदु लाल  रंगा अलमस्त ,और गोसाई जी के नाम से भी जाने जाते थे और फतेहाबाद की नगरपालिका के 1965  में वार्ड नंबर 04  पहले पार्षद घोषित हुए और दोबारा उन्हें नगरपालिका के उपप्रधान के पद (1968)से भी नवाज़ा गया । 

Jindu La Gosain Gali Ji

गोस्वामी जिंदु लाल जी का जन्म सन 1924  में पाकिस्तान के फतेहपुर जिला मुल्तान में अपने ननिहाल में हुआ । भारत पाक बटवारे के दौरान उनके पिता श्री लधु लाल जी रंगा अपने परिवार सहित एक पुत्री एक पुत्र और माता और अपनी धर्मपत्नी सहित पंजाब स्थित फाजिल्का शहर में खालसा कॉलेज में बने शरणार्थी कम्प में प्रथम कदम रखा और जिसके चलते उसी कैंप में  सप्ताह के भीतर उनका देहांत होगया। 

फिर उसके बाद परिवार की सभी जिम्मेदारी उनके कंधो पर आ गयी । और जीवन के शुरुआती दिनों में गरीबी और तंगहाली का सामना करना पड़ा।  तथा परिवार की जिमेवारी पूर्णरूप से निभाते निभाते वे फाजिल्का से रेवाड़ी 1  साल  के दौरान चले गए ,इसके बाद वे पंजाब पुलिस में हवलदार के पद पर भर्ती हुए झा उन्होंने रेवाड़ी के पुलिस थाना में कार्येभार संभाला। 

वे अपने माथे के तिलक और चोटी को लेकर अपने उपाधिकारी व् सहकर्मी से मतभेद रहता था । क्योकि उनदिनों के हालत ऐसी थे धरम को जायदा बढ़ावा नहीं देना था। इसलिए उच्चधिकारिये यहाँ तक भी उन्हें कहा था की अगर आप ऐसी ही अपने रूप में रहेंगे तो आपको पुलिस की नौकरी की छोड़ना पड़ेगा।  आखिरकार वही हुआ जो उन्होंने हवलदार की नौकरी छोड़ कर एक बर्तन बनाने वाली फैक्ट्री में काम शुरू किया और सं 1955  में जिला हिसार के फतेहाबाद क़स्बा के गांव मल्हर व् कुछ जमीन फतेहाबाद में अलाट हुई और वह कट्टर जनसंघी थे । 

वे  भारतीय जनसंघ पार्टी जिला हिसार 1970 में  डॉ मंगल सेन के साथ काम किया और गोसाई टेक चंद बहादर जी के वारिस भी थे इसके चलते बहुत ही श्रद्धालु हरियाणा राजस्थान पंजाब दिल्ली व्  अन्य कई जगह  से इनके पास आते जाते रहते व् नतमस्तक भी थे ,और इनके दवारा स्थापित श्री राधा कृष्ण मंदिर जो ग्राम कालिया जिला श्री गंगानगर में हैं और वर्ष माता के नवात्र चतुर्दशी पर मेला भी लगाया जाता हैं और इन्होने फतेहाबाद हरियाणा में श्री दुर्गा मंदिर की स्थापना भी करवाई और सवयं मंदिर सरंक्षक भी रहे इसके चले मंदिर को लेकर कुछ राजनितिक लोग मंदिर की जमीन को हथिआना चाहते थे। 

जिनका इन्होने भरपूर विरोध व् सामना हैं इस विरोध के चलते आम जनता ने इनका सहयोग किया और मंदिर आज अपनी विराजमान जगह पर शोभित हैं शहर कर मुख्या मंदिरों में नाम जाना जाता हैं ,और वे केंद्रीय पुष्करणा barhaman  सभा के भी सदस्य रहे । 

एक बार उनकी जमीन को कुम्हार जाति कुछ लोगों ने कब्ज़ा कर लिया ,जिसके पता चलते ही वे अपने कुछ साथियों को अपने साथ जीप में बिठा कर उन लोगों से कब्जे को लेकर बात चित करने गए लेकिन जब वो घर पर जा कर देखा  घर पर कोई भी मर्द नहीं था और वहा पता चला घर किसी महिला को प्रसव पीड़ा हो रही हैं तो उन्होंने अपनी जातीय लड़ाई एक तरफ रख उस महिला व् अन्य उनकी सास को जीप में बिठा कर फातेहाबाद के नागरिक अस्तपताल में भर्ती करवाया और चैन के साँस ली लेकिन बात यही ख़तम नहीं होती उनके इस मदद से हुआ ये की एक प्रसव पीड़ा झेल रही महिला ने एक सही सलामत लड़के को जन्म भी दिया जो की तीन पुत्रिया को बाद हुआ और जिन लोगों ने जमीन  कब्ज़ा कर रखी थी उन्होंने जमीन बिना मतभेद व् लड़ाई के वापिस कर दिए और नतमस्तक हुए की अपने हमारे  घर के चिराग की  जिंदगी बचाई हैं और पोतर  दवारा बताई गयी कुछ यादे ऐसी भी की उन्होंने बताया के एक बार 1990 -1991  जब हरियाणा और पंजाब में उग्रवाद चरमसीमा से उप्पर था तो इस बिच नगर परिषद् के चुनाव का माहौल था और गोसाई जी गंगानगर से फतेहाबाद अपने कुछ साथी नाम गुरुदयाल कथूरिया ,गायन चंद मेहता और गोसाई जी के पुत्र  और कालिया ग्राम के सरपंच शंकर लाल मिड्ढा के साथ आ रहे थे

जब उनकी गाड़ी  मासिता हेड (हनुमानगढ़ ) राजस्थान कनाल हेड पर पहुंची तो उनका सामना कुछ 40 -50  उग्रवादियों के सामना हुआ जिसमे कुछ लोगों के हाथो में हथियार थे ,जिससे उनके मुखिया ने गाड़ी से बहार निकलने को कहा और लेकिन मेरे दादा जी ने बहार आने से मना कर दिया और कहा की अगर आप मारना चाहते हो यही मार दो हम बहार नहीं आएंगे , इस पर मुखिया ने गौर से देखा  और पाया की बह्रमण हैं कुछ वार्तालाप हुई  जिस दरयिमान इनके कुलदेव दादा मान सिंह जी का वास उनके शरीर में देख कर उग्रवादी भी अचभित होगये तो उन्होंने इन्हे बिना कुछ कहे जाने कहा,

Swami Tulsidas Marg1970  के जय प्रकाश आंदोलन में भी हिस्सा बनने जिसके चलते इनको दो महीने के लिए अम्बाला जेल में रहना पड़ा । इस तरह से उन्होंने अपने जीवन को जनता सेवा और अच्छी व् धार्मिक विचारों से साथ जीवन अंतिम दिनों को बिताया और बिना किसी लम्बी बीमारी भगवान की सेवा करते करते 14  फरवरी 2004  को अंतिम साँस ली और गोलोक वास को गए,  वे ऐसी जिन्दा दिली इंसान थे अतःउनकी यादो को संजोय रखते हुए तत्कालीन सरकार बीजेपी नगर परिषद् फतेहाबाद ने उनके नाम से गली का नामकरण 2017 में किया (लंग मोहल्ला का नाम बदलकर जिन्दलाल गोसाई) वार्ड नंबर 3 वाली गली कर दिया हैं 

उनके पीछे उनके परिवार में उनकी पत्नी जून 2009  को अंतिम विदाई ली
उनका एकलौता पुत्र मुरली मनहोर जून 2007 में देहांत हो चुका हैं
अब एक पुत्री उषा पुरोहित रानी बाग़ दिल्ली 2020  में देहांत हो चूका हैं
दो पुत्रियां कांता देवी ( दिल्ली ) व् राज रानी (राजपुरा)
उनकी पुत्र वधु श्री मति निर्मला देवी (फतेहाबाद)
पोत्र संजय गोस्वामी (PNB  हेड केशियर फतेहाबाद) पत्नी श्री मति अंजू रानी
अजय गोस्वामी (अमोघ conf  रानी बाग़ दिल्ली ) पत्नी श्री मति ममता गोस्वामी
संजीव गोस्वामी (श्री नाथ जी वैरिटी स्टोर ,फतेहाबाद) श्री मति  हिमानी शर्मा

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