आचार्य कुलदीपक स्वर्गीय श्री बांके बिहारी शास्त्री आचार्य

Banke Bihari

स्वर्गीय श्री बांके बिहारी जी शास्त्री आचार्य का जन्म वर्ष 1921 में मुल्तान शहर (पाकिस्तान) में हुआ I वे स्वर्गीय पंडित लक्ष्मीनाथ जी आचार्य व श्रीमती श्याम देवी जी की एकमात्र संतान थे I वे बचपन से ही विलक्षण, सरल व सौम्य थे, जिनका जीवन संघर्ष व त्याग का सजीव उदाहरण रहा I बहुत छोटी अवस्था में ही उनके ऊपर से पिता का साया उठ गया I

वे इतने छोटे थे की उन्हें अपने पिता की धुंधली सी छवि याद थी I माता श्याम देवी जी ने बड़ी मेहनत व संघर्ष से इनका पालन पोषण किया और सुसंस्कारों से इनके बचपन को संवारा I अपने पिता की तरह वे भी ज्ञानी और विद्वान थे I उन्होंने 17 वर्ष की छोटी अवस्था में ही शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली I वे संस्कृत के बहुत अच्छे वक्ता थे I जब वे मात्र 18 वर्ष के ही थे तो अपनी कुशाग्र बुद्धि व सशक्त वक्तव्य के कारण वे एक स्कूल में संस्कृत अध्यापक के रूप में नियुक्त हो गए I

उनका विवाह मुल्तान के स्वर्गीय श्री पंडित साधु लाल जी की सुपुत्री कृष्णा देवी जी के साथ संपन्न हुआ I कुछ ही समय में इन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई, घर में खुशियां आईं I भारत पाक विभाजन होने पर वे दिल्ली आये और उन्हें लोधी रोड के एक सरकारी स्कूल में संस्कृत अध्यापक की नौकरी मिल गयी और शीघ्र ही मोती बाग में इन्हें सरकारी आवास भी आबंटित हो गया I

समय के साथ साथ इनका परिवार बढ़ा I पांच सुयोग्य पुत्रों और एक लक्ष्मी स्वरूपा पुत्री ने इनके घर में जन्म लिया I अपने परिवार के साथ सुखपूर्वक समय व्यतीत होने लगा I रामायण का उनके जीवन में बहुत प्रभाव था इसलिए उन्होंने इसके प्रचार के लिए मोती बाग में ‘मानस परिषद्’ नाम की एक संस्था बनाई I रामायण केवल मोती बाग तक ही सीमित न रहे, इसलिए वे उसका प्रचार पूरे दिल्ली प्रांत में करना चाहते थे I वे स्वर्गीय श्री पंडित त्रिलोक मोहन जी के साथ मिलकर ‘दिल्ली प्रांतीय रामायण सत्संग’ नामक संस्था के माध्यम से प्रत्येक रविवार को दिल्ली के विभिन्न स्थानों पर रामायण के पाठ किया करते थे I

उनके इस योगदान के लिए उन्हें ‘मानस मर्मज्ञ’ की उपाधि से सम्मानित किया गया I यह ‘दिल्ली प्रांतीय रामायण सत्संग’ रुपी पौधा अब पेड़ बन चुका है जिसकी छाया व फलों से अनेक लोग आज भी लाभान्वित हो रहे है I आज भी उनका परिवार प्रत्येक रविवार को होने वाले इस सत्संग से जुड़ा हुआ है I इसके अतिरिक्त वे दिल्ली के आकाशवाणी भवन से रामायण और गीता पर उपदेश दिया करते थे ताकि वे इसका प्रचार जन जन तक कर सकें I आकाशवाणी से यह प्रसारण 1964 से 1973 तक निरंतर चलता रहा I सामाजिक कार्यों में भी उनकी बहुत रूचि थी I वे केंद्रीय पुष्करणा ब्राह्मण सभा के कर्मठ सदस्य थे और वर्ष 1960 में सभा द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘पुष्करणा सन्देश’ के मुख्य संपादक भी थे I

14 अप्रैल 1974 को संपूर्ण उत्तरदायित्वों के बीच परिवार को छोड़ कर गोलोकधाम चले गए I यह इतनी बड़ी क्षति थी जिसकी भरपाई करना परिवार और पूरे समाज के लिए सर्वदा कठिन था I आज लगभग 47 वर्ष के बाद भी हम उनकी उपस्थिति को अपने बीच अनुभव करते हैं I वही हमारे जीवन का मार्गदर्शन करते हैं व वही जीवन में आने वाले हर छोटे व बड़े संकट से हमारी सुरक्षा करते हैं I हमेंयह पूर्ण विश्वास है कि उनकी अदृश्य सूक्ष्म उपस्थिति व शक्ति सदा हमारा पथ-प्रदर्शन करती रहेगी I

माधव आचार्य, विनयशील आचार्य, चन्द्रकान्त आचार्य, रंजन आचार्य, रमण आचार्य,
शोभा अरविन्द पराशर

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